सामाजिक मानदंड और व्यवहार का विवरण
1.पुत्र पारिवारिक संपत्ति के कानूनी उत्तराधिकारी हैं
2.लड़कियों का शीघ्र विवाह3.पुरुष देखभाल करने वाले/पोषण करने वाले
4..दहेज प्रथा
5.बेटियों पर बेटों को वरीयता
6.मासिक धर्म की वर्जनायेँ
7.लड़कियों की शारीरिक गतिशीलता पर प्रतिबंध
8.लड़कियाँ परिवार की अस्थायी सदस्य हैं
उपर्युक्त 1 से 8 तक सभी लैंगिक असमानता को दर्शाता है।सामाजिक रूढ़ि वादी विचार के कारण ही खान-पान, रहन-सहन,पढ़ाई-लिखाई आदि में बेटियों पर बेटों की वरीयता दी जाती है।जिसके कारण लैंगिक विभेद उत्पन्न होता रहा।परंतु वर्तमान में स्थिति थोड़ी बदली है।अब लड़कियाँ भी सभी क्षेत्रों में आगे बढ़ रही हैं।यहाँ तक कि लड़कों को भी पीछे छोड़ रहीं हैं।
दहेज प्रथा:-
दहेज प्रथा भारतीय समाज में एक कोढ़ के समान है। यदि महिलाओं की दिशा और दशा सुधारनी है तो दहेज रूपी कोढ़ का इलाज करना ही होगा।
बेटियों पर बेटों को वरीयता
वैसे तो अब समाज में काफी बदलाव आया है लेकिन अभी भी बेटों को वरीयता देना दिखाई देता है। इसे हमें पूर्ण रूप से समाप्त करना होगा।
मासिक धर्म की वर्जनायेँ
हमारे समाज में अनेकों भ्रांतियाँ इस सम्बंध में फैली हुई हैं। हमें उन भ्रांतियों का निवारण करना ही होगा। जिसके फलस्वरूप महिलाएं अनेक रोगों से अपना बचाव कर सकेंगी और एक स्वस्थ समाज का निर्माण होगा।
लड़कियों की शारीरिक गतिशीलता पर प्रतिबंध
आज लड़कियाँ भी पर्वतारोहण, खेल,प्रौद्योगिकी आदि क्षेत्रों में अपना परचम फहरा रहीं हैं। इसलिए लड़कियों पर प्रतिबंध लगाना विकृत मानसिकता का प्रतीक है।
लड़कियाँ परिवार की अस्थायी सदस्य हैं
हमें अपने समाज का यह मिथक तोड़ना होगा। अस्थाई सदस्यता की भावना लड़कियों को कमजोर बनाती है। अगर हमारे समाज की एक कड़ी कमजोर होगी तो हमारा सामाजिक ढाँचा भी कमजोर होगा। अतः हमें लड़कियों को भावनात्मक और मानसिक रूप से मज़बूत बनाना होगा।एक समान यह बात बिल्कुल सत्य है आज महिलाएं भी वो सब कार्य कर रही हैं जो पुरुष कर सकते हैं आज महिलाएं घरेलू काम काज तक ही सीमित नहीं है आज वह हर कार्य करने में सक्षम हैं फिर चाहे वो डॉक्टर हो, इंजीनियर, वकील, अध्यापक पायलट आदि में अपना नाम चमका रही हैं।
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