मीडिया के द्वारा जेंडर विभेद का चित्रण

 वैसे तो किसी भी व्यवसाय में लिंग भेद उचित नहीं माना जा सकता परन्तु हम लिंगभेद को बढ़ावा ना दे इसकी शुरुआत हमें स्कूली शिक्षा से ही करनी होगी। स्कूल वह स्थान है जहां पर हम छात्र व छात्राओं के निकट संपर्क में रहते है। अतः सभी शिक्षकों को लिंगभेद के पूर्वाग्रहों से ऊपर उठ कर कार्य करना चाहिए तभी हमारी भावी पीढ़ी का नव निर्माण हो सकेगा तभी हमें यह मानना चाहिए कि हम सच्ची शिक्षा दे पाए।जेंडर के मीडिया चित्रण का विश्लेषण इस तरह से इस वीडियो (https://youtu.be/y4QxRV4pMcI) में भी बहुत ही अच्छे तरीके से दर्शाया गया है कि "असमानता सीखी जाती है, और समानता को शिक्षण की आवशकता है.

असमानता जाने या अंजाने बच्चे सीख जाते हैं आस पास वाले लोगो से क्योंकि बुजुर्ग लोग इसे सही मानते है और उन्होंने असमानता को उसी प्रकार मान लिया है। लेकिन समानता को समझने के लिए खुले विचार और सबको समान रूप से देखने की मानसिकता होनी बहुत हीं आवश्यक हैं, तभी हम समानता को अपनी आने वाली पीढ़ी को दे सकेंगे।


समानता को बढ़ावा देने वाला ये विज्ञापन भी बहुत प्रभावशाली है, जिसमे पुरानी धारणाओ का खंडन बहुत ही सहज तरीके से किया गया है। विज्ञापन का link:-https://youtu.be/k0qVpWIw54w इसमें भी चित्रित किया गया है।मीडिया के द्वारा जेंडर विभेद के प्रति समाज को जागरूक करने की आवश्यकता है।समाज मे जेंडर विभेद से उत्पन्न होनेवाले कुरीतियों को भी मीडिया के द्वारा चित्रित किया जाना चाहिए।जिसके सिर्फ एक ही उदेद्श्य हो"बेटा-बेटी एक समान"।

Comments

Popular posts from this blog

सूचना एवं संचार तकनीकी से मूल्यांकन

कला समेकित शिक्षा

The memories lane